Friday, 5 August 2011


वो ख़ुशी 
न मिलो मुझसे, न देखो मेरी तरफ
इक धुंध का बादल हूँ बिखर जाऊँगा, 
चट्टान से नीचे दुनिया लगे दिलकश
मोड़ से आगे न जाने किधर जाऊँगा,
दरख्तों में कहीं बसते हैं ढेरों जुगनू  
ज़रा ठहर ज़िन्दगी, मैं फिर आऊंगा,
न बाँध कोई धागा उभरती साँसों को 
दर्द के रिश्तों से न, यूँ  उभर पाऊंगा,
साए की मानिंद मुहोब्बत ठीक नहीं 
पत्तों की तरह इकदिन झर जाऊँगा,
न रोक मेरी राहें कि मंजिल पुकारतीं 
रात से पहले अंधेरों में घिर जाऊँगा,
कुछ भी तो नहीं बाक़ी, कि दे सकूँ -
फिर कभी सही वो ख़ुशी भर जाऊँगा,
-- शांतनु सान्याल