Thursday, 25 August 2011


ग़ज़ल 

जिगर की आग और ये जलता हुआ आसमां -
ज़िन्दगी ठहरी रही देर तक बारिश की चाह में, 

वो बच्चा रोता रहा बीच सड़क, भीड़ में कहीं -
बचपन बिखरता रहा, एक वारिस की चाह में, 

गुलमोहर खिले, यहीं पे कहीं ये ख़बर ही नहीं -
हाथ बढे नहीं, सर झुके थे आशीष की चाह में,

कौन गाता है रात ढले, तन्हां, दर्दभरी ग़ज़ल -
पत्थर न पिघले,उम्र गुज़री तपिश की चाह में, 

न छू यूँ बार बार इस मजरुहे ज़िन्दगी को तू -
चला हूँ  टूटे कांच पे, इक बख्शीश की चाह में,

देखा है, बहुत क़रीब से बहार को मुंह फेरते  -
हूँ अब तक नादां, किसी परवरिश की चाह में, 

 -- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/