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Tuesday, 19 July 2011

कंटीली सीमा रेखा 
 
टूटे सीप, शंख, शंबुक, जीर्ण शैवाल
कराह्तीं सागर तरंग, अस्ताचल से
पहले डूबता उभरता ये जीवन सूर्य !
एक अकेला सुदूर क्षितिज में खेता
जाय आश भरी नौका अविराम, वो
प्रतिध्वनित स्वर रचे स्वप्न मधुर,
क्लांत ह्रदय चुनना चाहे बिखरी -
सांझ लालिमा एक एक,उभरे सहसा
कोई शुक्रतारा प्रतीच्य गगन में, ले
नीलाभ किरण मुस्कान भरा, मन
चाहे फिर जीवन में लिखूं गीत नया,
जिसमे हों मासूम, निष्पाप शिशु की
निश्छल छवि, खिलता हुआ ज्यों
नवजात गुलाब, सभी दुःख दर्द से दूर,
एक ऐसी दुनिया जहाँ तुम तुम न
हों, मैं मैं न रहूँ, एक दूसरे में हों डूबे -
अपना पराया जहाँ कोई नहीं, न
कोई भूभाग न ही कंटीली सीमारेखा !


-- शांतनु  सान्याल