Saturday, 16 July 2011

नज़्म
न देख फिर मुझे तर्क़ब नज़र से यूँ
मजरूह जिस्म, दर्दे शख्सियत ले
किस तरह से तेरी मुहोब्बत क़ुबूल
करूँ, कि ये खुशफ़हमी न दे जाये -
कहीं तवील जीने की सज़ा दोबारा,
रहने भी दे ये इश्फाक़े इनाम नया !
अभी अभी तो छायें हैं बादल घने -
बरसने दे निगाहों को दो पल कि
दूर हो जाएँ ज़रा सदियों की वीरानगी,
कोई ख़ूबसूरत गुले सबार तो खिले -
खुश्क़ दिल में गिरे चंद शबनमी बूंदें,
बोझिल सांसों में सजे संदली ख़ुश्बू
फिर बिखरतीं लहरों को साहिल मिले,
ज़िन्दगी को जीने का अंदाज़ मिले,
-- शांतनु सान्याल
तर्क़ब - आशा भरी
तवील - लम्बी
 इश्फाक़े इनाम - सहानुभूति का इनाम
 गुले सबार- कैक्टस