Tuesday, 12 July 2011


पल भर तो रुके
ये ख़ामोशी है या कोई मत्सूफ़ नज़र 
हर एक क़दम में बहक जाय है डगर,
ये ख़ुमारी न डूबा ले जाये मुझे, जिससे 
बचता रहा मंजिल- मंजिल शहर- शहर,
चाहो तो अता कर जाओ जी चाहे सज़ा
न दो मुझे यूँ शहद के नाम पे दर्दे ज़हर, 
आह भी इक इल्ज़ाम ए आरज़ू सा लगे 
सांस भी लेना है मुश्किल,ये इश्क़े असर,
कहीं तो होगी इलाजे मकां, बेचैन जिगर 
पल भर तो रुके सही,  बरसात ओ क़हर,
-- शांतनु सान्याल
 मत्सूफ़ - रहस्यमयी