Monday, 11 July 2011


नज़्म 
गुज़रीं हैं बादे सबा अक्सर उदास सी 
इस ज़मीं का आसमां कोई नहीं,
खिलते हैं गुल ओ ज़ोहर दिलकश 
अंदाज़ लिए, ज़माने को फुरसत ही 
नहीं कि देखें इक नज़र के लिए, 
वहीँ रुकी सी हैं तमाम फ़सले बहार 
तरसतीं हैं निगाह  दर्दे असर के लिए,
न जाने किस मक़ाम पे बरसतीं हैं 
बदलियाँ, मुद्दतों ज़मीं तर देखा नहीं, 
कोई सबब शायद उन्हें मुस्कुराने नहीं 
देतीं,वरना चाहत में कमी कुछ भी न थीं !
-- शांतनु सान्याल