Tuesday, 21 June 2011


आज़ाद नज़्म 
न करें ताज्जुब ये मेरी ही ताबूत है


ले चला हूँ काँधे पे लादे  दफ़न के लिए 
ये कोई पहले दफ़े की बात नहीं, न 
जाने कितने बार मर चूका हूँ मैं,
ग़र न हो यकीं पूछ लीजे इन खामोश 
दरख्तों, सिमटते छाओं, सफ़ेद -
पोश चेहरों, सुलगती हुयीं वादियों से -
अपनी ही हाथों जला आया हूँ 
हसरतों को,ख्वाबों के बियाबानो को 
जिस्त की बेपनाह मुहोब्बत ही 
थी कि लौट आती है,ये  रूह  बार बार 
कभी भूख बनकर,कभी बिकाऊ 
जिस्म बनकर,भटकती है अक्सर ये 
आवारा आम सड़कों पे, और कभी 
रात ढलते समेटती है झूठे बर्तनों को, 
तलाशती है इक ज़रा सी जगह
स्टेशन की गलीच फर्श में,फुटपाथों में,
उसे नींद आती है पुरअसर बिना 
कोई दवाओं के, कहीं भी, दरअसल वो 
थकन ही है उसका बदन,जो किसी से 
कुछ नहीं कहता, बिखरता है हर 
पल, मिटता है लम्हा लम्हा, तिल तिल 
ये मुसलसल मौत ही उसे बना जाता 
है बेअसर, ज़हर आहंग, नासूर 
दर्द, न कभी रिसता है न ही फटता है 
सिर्फ सीने की गहराइयों में लिए 
ज़लज़ले, धधकता, कांपता, सिसकता
तकता है सिफ़र आँखों से आसमां
की खूबसूरती, लेकिन छू नहीं सकता !
--- शांतनु सान्याल