Sunday, 26 June 2011

वो इश्क़ जो आप चाहें कि दे न सकूंगा 
है बहुत मुश्किलभरी  जिंदगी की राहें,
और कहीं दोस्त मेरे, ढूंढ़ लें मंज़िल नया 
इस राह पे हैं सिर्फ घने तीरगी के बाहें ,
इस सराबे ख़ुशी का सऊर न दिला कि
खोजतीं हैं मुझको फिर मतीर निगाहें,
-- शांतनु सान्याल
सराब - मरीचिका 
सऊर - चाहत, 
मतीर - भीगी