Thursday, 7 April 2011

संभवतः


सुबह फूलों की बहार वो भीगा रविवार 
सहसा पुराने दर्पण का टूट जाना 
हाथों से फिसल ज़मीं  पर बिखर जाना 
कुहरा मय आकाश, धूसर बादलों के दाग़ 
हस्त चिन्हों की तरह स्थूल 
वाष्प कणिकाएं , खिडकियों के शीशे
आईने के टुकड़ों का संग्रह 
फूलों के गमले, कुछ अनकही बातें 
पुराने ख़तों का उड़ उड़ बिखर जाना
अर्ध पढ़ी किताब के पृष्ठों का आन्दोलन 
दरवाज़े पर दस्तक का आभास 
सोंधी ख़ुश्बू संभवतः वृष्टि आगमन 
एक शिशु हाथों में लिए नन्हा सा फूल 
कहे आओ मेरे साथ बाहर उड़तीं हैं 
कितनी रंग बिरंगी तितलियाँ 
आँखों में जीने की उम्मीद 
बादलों का ज़ोरों  से बिखर  जाना.
--- शांतनु सान्याल