Tuesday, 8 March 2011

नज़्म

 नज़्म 
अफ़सोस क्या करें हम ये रश्मे दुनिया है -
निभा जाओ तुम भी ज़माने के दस्तूर,
न पहचाने की वो अदायगी है ख़ूबसूरत 
हैं टूटती बूंदें आखिर बिखरने को मजबूर, 
हिसाब क्या करें सुबह की धूप के लिए -
यूँ भी ज़िन्दगी में दर्दो अलम हैं भरपूर,
ये सितारों की भीड़, फिर रात की नीलामी 
ख़्वाबों न छुओ मुझे, हूँ मैं थकन से चूर,
वो सभी मरहम  दे न सके राहतें उम्रभर -
लौटा दिए, माना है मंज़िल बहुत ही दूर, 
न देखो मुझे फिर उसी अंदाज़े वफ़ा से 
ग़र ज़िन्दगी रही तो लौट आएंगे ज़रूर,
--- शांतनु सान्याल