Sunday, 13 February 2011

रात ढलते

उम्मीद हद से आगे न बढ़े इसका भी ख़याल हो
 दिल ग़र खो जाय कहीं उसका न ज़रा भी मलाल हो,
इतना क्या सोचते हो के ख़ुद को ही यूँ  भूल जाओ
न रुके कोई किसे के लिए खुश रहो जहाँ जिस हाल हो,
उस नुक्कड़ में सजती हैं, यूँ महफ़िलें रात ढलते
 तकते हो आसमां,जैसे कोई अनसुलझा इक सवाल हो,
 सूख जाएँ न कहीं मौसमी फूलों के दरीचे,ऐदोस्त !
निकल भी आओ क़फ़स से,जहाँ तुम अभी बहरहाल हो,
थाम भी लो निगाहों के ऐतराब, ख़्वाबों की दुनिया
क़बल इसके के हर सिम्त,पुरसर हंगामा ओ बवाल हो,
इस रात के दामन से हैं कुछ राज़े उलफ़त वाबस्ता
न खुले वो रिश्तों के गिरह,चाहे हर जानिब भूचाल हो,
--- शांतनु सान्याल