Tuesday, 25 January 2011

सूनापन

अरण्य अनल सम जागे मन की
सुप्त व्यथाएं
दूर कहीं टिटहरी टेर जाय
फिर जीवन में दहके बांस वन,
पल छिन बरसे मेह
झर जाएँ मौलश्री
स्थिर ह्रदय को जैसे दे जाए
दस्तक, कोई विस्मृत सन्देश,
भीगी साँसों में कोई चेहरा
उभरे डूबे बार बार
लहरों से खेले चाँद आँख  मिचौली
हिय उदासीन, जस अधखिली
कुमुद की नत पंखुडियां
रह रह जाय कांप,
रात की अंगडाई तारों से सजी
मेघों ने खोल दिया रात ढलते
सजल शामियाना आहिस्ते आहिस्ते,
खुली आँखों में मरू उद्यान  बसा
सपनों के क़ाफिले रुके ज़रूर
गीतों की बूंदें बरसीं
स्मृतियों ने बांधे नुपुर सुरीले
धड़कनों में था लेकिन सूनापन
आकाश ने उड़ेला पूरा आलोक
हमने चाहा बहुत मुस्कुराएँ
हँसी ओंठों तक पहुँचीं सहमे सहमे
सुबह से पहले बिखर गयीं सब
ओष की बूंदें बन कर .
--- शांतनु सान्याल