Friday, 8 October 2010

दो किनारे



दूर बहुत दूर नदी के दो किनारे



क्षितिज में शायद मिलते हों कहीं,



या महा समुद्र दोनों को निगल जाती



है, ये सोच तुम कि कहीं लवणीय



हो जाओ, ये सोच कि मैं मिठास



भूल जावूँ ,एक दूरी में बहते रहे पृथक



श्रावण के सघन मेघों ने चाहा कि एक



गुप्त संधि हो मध्य हमारे,घातक



तड़ित ने उसे बार बार यूँ तोड़ा की



हम चाह कर भी एक दुसरे के समीप



सके , समानान्तर प्रवाहित रहे /



-शांतनु सान्याल




Sunday, 3 October 2010

सनातनी

सनातनी 

वो सूर्य रथ के महा योद्धा अग्निवीर धर रूप विकराल 

पांचजन्य से झंकृत हो समर पथ, आलोकित नभ पाताल

सघन  मेघ से हो प्रगट हुंकारित हे त्रिनेत्र महाकाल 

भरत भूमि करे त्राहि त्राहि, पूर्ण वरदान दे, हे! त्रिकाल 

सनातनी चाहें परित्राण त्वम् लौह हस्ते भविष्य काल

सर्व मनु वंशज वृन्द लें सपथ, प्रति  क्षण साँझ सकाल

दे आशीष कि हम हों एक, हो चहुँ ओर प्रेम बहाल

जाति पांति भेद विभेद विस्मृत हों, जले एक मशाल

हिंदुत्व बने विश्व पुरोधा, संगृहीत एक कुटुंब विशाल

हम दर्शायें पथ जीवन का, रच जाएँ नव अमिट मिशाल

हो पुष्प वर्षा जिस पथ जाएँ,हिंदुत्व पाए अमरत्व चिरकाल //

-- शांतनु सान्याल

Saturday, 2 October 2010

मोक्ष

वैतरणी पार थे, वो सभी आत्मा 

आज फिर क्यों फल्गु तट पर आ खड़े 

नत मस्तक वो सर्व अतृप्त प्रेत गण

चाहें क्यों घट श्राद्ध स्वयं का,

आत्मीय स्वजन ने किया हो शायद 

परित्याग, पितृ दोष माथे कौन लेगा

केश मुन्चन, यज्ञोपवित,अधोवश्त्र

धारित वो चिर परिचित मुख,

करबद्ध क्षमा याचक सरिता तीर,

शांत सलिल ने कहा - हे वत्स, जाओ 

प्रथम करो प्रायश्चित, देश हित में कुछ 

करो कार्य, राजभोगी से राज योगी बनो, 

तत्पश्चात देशप्रेम का अर्घ्य लो हाथों में 

कश्चित्  पुनर्जन्म में मिले मोक्ष - तथास्तु //

-- शांतनु सान्याल