Thursday, 23 December 2010

नज़्म

नज़्म
ये माना कि ज़िन्दगी में हर ख़ुशी नहीं
 मिलती, हर्ज़ क्या हैं आखिर मुस्कराने में,
हासिये में थे हम  ये सच है, बावजूद
वक़्त लगता है ज़रा, तूफ़ान गुज़र जाने में,
किसी ने नहीं देखा हवाओं का दम घुटना
भीगी ख़ुश्बू का बहाना बना गए हम,
छलकते आँखों में थे ज़ख्म बेक़रां
सिसकतीं साँसों का तराना बना गए हम,
रिश्तों की बारीकियां हमसे न पूछो
टूटतीं हैं साँसें हर बार साहिल से लौट कर,
चाँद की रौशनी हरगिज़ कम न थी
बिखरे हैं दर्द लेकिन बारहा दिल से लौट कर /
-- शांतनु सान्याल