Friday, 10 December 2010

इक बूंद

पिछले पहर हमने भीगे गुलों में
कोई अनजान सी छुअन देखी है,
न जाने कौन छू सा गया दिल को
सीने में मीठी सी चुभन देखी है,
अधखुली किताब में  बिखरे आंसू
हर लफ्ज़ में हमने अगन देखी है,
 भरम कि तुम हो हमारे,रहने दो
खंडहर में हमने  मधुबन देखी है,
ढल गया चाँद कब पता न चला
ख़ामोश शब,होलीसीदहन देखी है,
वजूद अपना हम कहीं भूल सेगए   
इक बूंद की तरह यहाँ जीवन देखी है,
--- शांतनु सान्याल