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Wednesday, 8 December 2010

अभी अभी,

इस अहसास में कितने दिए जल उठे
गुज़रे हैं वो बहुत  क़रीब से अभी अभी,
देखा है टूटते तारों को बहुत दूर से
मिले हैं वो बड़े  नसीब से अभी अभी,
महके हैं क़फ़स के दरो दीवार
 आये कोई पार, दहलीज़ से अभी अभी,
फिर सजाएँ कोई ख़्वाब  आँखों में
देखा है उसने, नज़दीक से अभी अभी,
बहुत मुश्किल था आह भरना मेरा
मिले है हम ज़िन्दगी से अभी अभी,
हर फूल लगे ख़ूबसूरत दिल की तरह
भरा है जिस्म ताज़गी से अभी अभी,
लबरेज़ हैं ख्वाहिशात छलकने को
राहतमिली है तिश्नगी से अभी अभी ,
बहकते हैं क़दम होश न हो जाय गुम
मिले हैं जाने अज़ीज़ से अभी अभी //
-- शांतनु सान्याल