Monday, 15 November 2010

ग़ज़ल


बदलियाँ बरस कर खो गयीं जाने कहाँ, अब पुरसुकून आराम लगे
वादियों से उठता धुआं गहराए, अब दिल में थम सा गया कोहराम लगे,
तिश्नगी-ऐ-दिल बड़ा बेचैन था, आँखों के बरसने से पहले ऐ दोस्त
भीगीं पलकें, उठतीं गिरतीं बूंदें, आज ख़ूबसूरत फिर मखमली शाम लगे,
सूखे फूलों के निशाँ बाक़ी हैं, ज़िन्दगी बेदाग़ नहीं साहिब
हूँ अजनबी ये निगाहों का फर्क़ है, वैसे जाना पहचाना ये गाम लगे ,
चिराग़ों के शहर में गुमसा गया कहीं, वो अंधेरों का दोस्त मेरा,
आइना भी सबूत चाहे ये और बात है,शायद चेहरा मेरा भी गुमनाम लगे,
वो ख़त अब तलक है मौजूद, क्या हुआ तहरीरें मिट गईं जिसकी
छुं लूँ उसे ,अहसास मीठा मीठा , दिल के क़रीब अबतक वो नाम लगे,
उस बज़्म में तन्हा बचाता रहा , अपने साए को बार बार
सनम परस्तिश, न जाने और क्या, बहोत प्यारे वो सभी इलज़ाम लगे,
दीवानगी इतनी की मरना भी चाहूं, और कभी जीने की आरज़ू जागे
इब्तदा तो याद नहीं , बेखौफ़, बेअसर एक सिद्दत-ऐ-अंजाम लगे,
-- शांतनु सान्याल