Thursday, 25 November 2010

पारदर्शी प्याला - ग़ज़ल

मैंने खुद ही पिया है पारदर्शी प्याला, विष या सलिल जो भी हो
सलीब पे ज़िन्दगी कब थी आज़ाद, प्यास है सृष्टि की आग
इश्क़ का रंग भी है पानी की तरह, जिस्त को हासिल जो भी हो,
वो तमाम चेहरे बन कर आयें हैं फिर रहनुमा या तमाशाई ?
दिल तो मोहरा बन चुका, अब आसान या मुश्किल जो भी हो,
न पूछ  दीवानगी, ज़हर पियूँ ग़र मैं, तुम नीलकंठ बन जाना
हमने  हयात-ऐ- फ़िरदौस जी ली, मुख़्तसर या तवील जो भी हो,
लोग क्यों किस्तों में करते हैं खुशियाँ तलाश, लम्हा दर लम्हा,
हमने  बाँहों में समेट ली ऐ दुनिया , दर्द-ऐ-मुस्तक़बिल जो भी हो,
--- शांतनु सान्याल
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