Tuesday, 16 November 2010

नव स्वप्न


प्रागैतिहासिक हिंसकवृति सहजता से नहीं जाते
रक्त व् मांस की वो ज्वलित गंध
संस्कृति व् सभ्यता के तिमिर गुफाओं में
प्रतिबिंबित होते बारम्बार
सुप्त सरीसृप सम मानवीय अनुबंध
उच्चारित होते अक्सर प्रणय मन्त्र बीच
मैं और केवल मैं प्रतिध्वनि मध्य
हो जैसे सम्पूर्ण वसुधा समाहित
बंधुत्व व् प्रेम जहाँ एक मिथक
दंश प्रतिदंश, सम्बन्ध जहाँ विषदंत
हर पल जैसे मौन चिर विनिमय
परित्यक्त ह्रदय, अवहेलित भावना
अभिशापित देह व् सतत उत्खनन
फिर भी चाहे जीवन एक नव आरम्भ
इन्द्रधनु से छलके प्रतिपल नव स्वप्न /
--शांतनु सान्याल