Tuesday, 30 November 2010

कई मधुर स्वप्न जागे

सुदूर मुहाने में अप्रत्यासित कई  मधुर  स्वप्न जागे
चंचल सरिता और जलधि मिलतें हैं कहीं जा आगे ,
उस मिलन बिंदु में हैं, प्लावित कुछ अनंत अनुबंध
कुसुमित आद्र भूमि, जहाँ मोहित, बावरे हैं मकरंद,
  प्रीत की असंख्य पाल नौकाएं,बहतीं जाएँ  धीमे धीमे
जीवन लहर गिरतीं उठतीं, मचलती  जाएँ धीमे धीमे,
वारिद नयन, तृषित ह्रदय, मधुरिम ये समर्पण लागे
सुदूर मुहाने में अप्रत्यासित कई मधुर स्वप्न जागे /
-- शांतनु सान्याल