Saturday, 27 November 2010

मधु स्पर्श

नीरव रजनी, झरे थम थम पारिजात
महके निशिगंध,निश्तब्ध पीपल पात,
नेह सजे फिर बैरागी, भूलें हम संसार
अतृप्त श्रोत बहती ,अंतर्मन दोनों पार ,
अहर्निशी सुप्त यमन गाए निर्झर गान,
अशांत ह्रदय, क्लांतमय, मम देह प्राण,
जलरंग चित्र, रिश्तों के नाज़ुक दीवारें,
घुलनशील स्मृति कण, ये दर्द की फुआरें,
मायावी पृथ्वी, जी चाहे स्वर्ण हिरण
अलकों में मोती, देह बने सीप आवरण,
सुरभित स्वर, मुखरित शेष प्रहर संगीत,
अधरों में मधु स्पर्श, ह्रदय पुष्प मनमीत,
-- शांतनु सान्याल