Monday, 15 November 2010

नज़्म


कोई शख्स तन्हा किसी को हर सू तलाश करता रहा
छू भी न सके जिसको, उसे पाने की आस  करता रहा,
सितारे डूबते गए , दूर स्याह  आसमां की गहराइयों में
न जाने क्यों तमाम रात, खुद को उदास करता रहा,
चाँद की परछाई, समंदर से लुकछुप करती रही बारहा
वो जागी नज़रों में , ख्वाबों को यूँ अहसास करता रहा,
कब रात ढली , अलसाई निगाहों में लिए अफसाने
उम्र भर इसी उलझन में अपने आपको हताश  करता रहा,
-- शांतनु सान्याल