Saturday, 20 November 2010

शबनम की तरह बिखर जाएँ

रजनीगंधा के गुच्छों में शबनम की तरह बिखर जाएँ
चाँदनी रात है,  दूर तलक बिछे हैं, हसरतों के मोती
खुशबू-ऐ-जिस्म है या शाख-ऐ-गुल, जी चाहे निखर जाएँ /
किसी की धडकनों में छलकती हैं मधु बूंदों की खनक
इक नशा है, छाया शब्-ऐ-तन्हाई में चाहे जिधर जाएँ /
नज़्म ओ ग़ज़ल, गीत ओ संगीत, राहों में हैं  बिखरे पड़े
किसी के क़दमों तले मौजें हैं रवाँ, दिल चाहे संवर जाएँ /
रात के पखेरू तकते हैं, उनींदी आँखों से बार बार हमको
 सागर के सीने में कौंधती हैं, बिजलियाँ ज़रा ठहर जाएँ /
कश्तियाँ भूल गये रस्ते, चाँद भटके है   मजनू की तरह
आसमां ओ ज़मीं के दरमियाँ, शिफर को इश्क़ से भर जाएँ /
इस रात की गहराइयों में चलों खो जाएँ सुबह से पहले
छु लो  यूँ ही  बेखुदी में, कहीं  शाखों से ,न  सभी फूल झर जाएँ  /
--- शांतनु सान्याल