Saturday, 13 November 2010

अनाम फूल की खुशबू


वो किसी अनाम फूल की खुशबू
बिखरती, तैरती, उड़ती, नीले नभ
और रंग भरी धरती के बीच,
कोई पंछी जाए इन्द्रधनु से मिलने
लाये सात सुरों में जीवन के गीत
वो कोई अबाध नदी
कभी इस तट कभी उस किनारे
गाँव गाँव , घाट घाट
बैरागी मनवा बंधना कब जाने
पीपल रोके, बरगद टोके
प्रवाह बदलती वो कब रुक पाती
कलकल सदा बहती जाती
वो कोई अनुरागी मुस्कान
अधर समेटे मधुमास
राह बिखेरे अनेकों पलास
हो कोई अपरिभाषित प्रीत
आत्मीयता का नाम न दो
खुशबू, पंछी और नदी
रुक नहीं पाते रोको लाख मगर
ये बंजारे भटकते जाते
सागर तट के घरौंदें ज्यों
बहते जाये लहरों के बीच /
-- शांतनु सान्याल