Friday, 8 October 2010

दो किनारे



दूर बहुत दूर नदी के दो किनारे



क्षितिज में शायद मिलते हों कहीं,



या महा समुद्र दोनों को निगल जाती



है, ये सोच तुम कि कहीं लवणीय



हो जाओ, ये सोच कि मैं मिठास



भूल जावूँ ,एक दूरी में बहते रहे पृथक



श्रावण के सघन मेघों ने चाहा कि एक



गुप्त संधि हो मध्य हमारे,घातक



तड़ित ने उसे बार बार यूँ तोड़ा की



हम चाह कर भी एक दुसरे के समीप



सके , समानान्तर प्रवाहित रहे /



-शांतनु सान्याल