Wednesday, 29 September 2010

नज़्म

कुछ रिश्तों के शायद कोई  उनवान नहीं होते
निग़ाहों में इक ख़्वाब लिए बैठे हो मेरी जाँ,
 कुछ क़दीम दर्द इतने भी आसान  नहीं होते
वो जो मेरा हमदर्द, हमराज़ था इक दिन
नजदीकियां सरे बज़्म यूँ ही  बयाँ नहीं होते,
वादियों में फूल खिले  हैं, मौसम से पहले
हर महकती आरज़ू लेकिन गुलिस्ताँ नहीं होते //
-- शांतनु सान्याल