Sunday, 26 September 2010

नज़्म

नज़्म


ज़िन्दगी की वो तमाम उलझनें भूल जाएँ

कुछ देर के लिए ही सही करीब तो आओ

मुस्कराएँ मिलके दो पल, सारे बहाने भूल जाएँ

तुम्हारे अश्क में चमकतीं हैं, अक्सर

कुछ मेरे दर्द की बूंदें रह रह कर

छू लो मुझे फिर से, अपने या बेगाने भूल जाएँ

कांपती हैं, क्यूँ जज़्बात किसी लौ की तरह

न छुपाओ, के दिल में चिराग है तुम्हारा

थाम लो मेरी साँसें, नासूर ज़ख्म पुराने भूल जाएँ

करें भी तो क्या,शिकायत हम किसी से

वक़्त के आगे कौन ठहरा है, ऐ हमनशीं मिले

डूबती नज़र को साहिल, मंजिल अनजाने भूल जाएँ //

-- शांतनु सान्याल