Sunday, 5 September 2010

मधुरिम एक अनुबंध


भीनी भीनी मीठी सी सुगंध
साँसों में खिले हों
जैसे सहस्त्र निशिगंध
स्पर्श तुम्हारा दे जीवन को 
मधुरिम एक अनुबंध 
नेहों से बरसे प्रणय बूँद 
मन विचलित ज्यों मकरंद 
अधरों में ढले मधुमास 
शब्दों से छलके मधुछंद 
आम्र मुकुल सम कोमल अंग 
रसिक पवन चलत थम थम 
खुले कुंतल बलखाये पल छिन
पथिक भरमाय अदृश्य सरगम 
चलत बाट ज्यूँ लहरे कदम्ब डार
जमुना नीर बहत मद्धम मद्धम 
कृष्ण निशब्द  निहारत रूप 
शशि मुख राधा हसत अगम //
-- शांतनु सान्याल