Friday, 3 September 2010

क़सम

दहकते आग से गुजरने की


क़सम खाई है

न पूछ मेरे सीने की

जलन का आलम

ग़र सांस भी लूँ तो अंगारों

की तपिश होगी

मेरे अहसासों में कहीं

अब तक सिसकता बचपन

मेरे आँखों में कहीं अब तक

बिकती हुई जवानी है

मेरे पहलु में कहीं अब तक

भूख से लाचार भटकती

जिंदगानी है

कैसे लिखूं खुबसूरत ग़जल

मेरे दिल में अभी तक

नफरत की निशानी है

तुम चाहो तो बदल लो रुख अपना

मेरे जिश्म ओ जां में अब तक

सुलगते ज़ख्मों की बयानी है

आसां हमराह मेरे चलना

मैंने इस रह में मिटने की

क़सम खाई है //

-- शांतनु सान्याल