Friday, 3 September 2010

अग्नि पुरुष


त्रिशूल, खड़ग,मस्तक रक्त तिलक



अग्नि पुरुष हो समर प्रस्थान,


अर्घ्य शीश अर्पण,हो धर्मार्थ


अश्व रोहण, हस्ते केशरी ध्वज


रिपु मर्दन हेतु कर प्रस्थान //


तू सूर्य सम सहस्त्र अश्वारोही


गर्जत बरसत मेघ सम वीर पुरु


विध्वंस हो अधर्म, सर्वांश कुरु


नव श्रृष्टि हेतु कर सर्वस्व दान //


हे सिंह वदन, परिपूर्ण मनुष्य


झंकृत हो नभ कर महा गर्जना


कोटि कोटि जन उद्वेलित, करे प्रार्थना


हे नव युग पुरुष कर तिमिर अवसान //


-- शांतनु सान्याल