Friday, 27 August 2010

छणिका

नीरव वसुधा, निस्तब्ध रजनी
हिय चंचल गुंजरित, मेघ बिन दामिनी / 
मधु मालती महके, निशि पुष्प वृंत
अभिसारमय चर अचर, राग रागिनी /
पथ निहारत, अंग प्रत्यंग अकुलाय
शशि मुख मेघ, जस नभ अभिमानी  /
पग विचलित, चलत अंचल ढल जाय
बैरन दर्पण, प्रतिबिम्ब अगन लगाय
देह मुर्छितमय, दंश करत मधु यामिनी //  
--- शांतनु सान्याल