Sunday, 8 August 2010

ग़ज़ल

न कोई आग न धुंआ ज़िगर जलने का मंज़र ही देख जाते
सुना है वादियों में टूट कर, दूर तलक बरसें हैं फिर बादल     
भरे बरसात में शायद, दिल सुलगने का मंज़र ही देख जाते/
साँसें रुकीं रुकीं आह भी मुश्किल निगाहों में डूबतीं परछाइयाँ
बुझते चिराग़ों से सरे आम,  दम निकलने का मंज़र ही देख जाते/
सूनी दीवारों में अब तक, महफूज़ हैं कुछ ज़ख्म माज़ी के रंगीन 
सीने में सुलगती आग, ओ अश्क बिखरने का मंज़र ही देख जाते /
ओ तमाम खूंआलुदह ख़त जो तुमने कभी लिखे थे इश्क़ में डूब कर 
शाखों से टूटते पत्तों की तरह, अलफ़ाज़ गिरने का मंज़र ही देख जाते/
ग़र फुर्सत मिले कभी  भूले से ही सही क़ब्र की जानिब जाना 
जुनूं ऐ हसरत ये है के, रूह भटकने का तुम  मंज़र ही  देख जाते  /  
-- शांतनु सान्याल