Sunday, 1 August 2010

छणिका

ज़रा सी देर


ज़रा सी देर




छणिका


न पूछ मेरी उदासी का सबब, कुछ देर ज़रा शमा जलने दे

गिर न जाएँ पलकों से शबनम, रात और ज़रा ढलने दे /

हर शख्स के हाथों में फूलों के तहरीरें, लब पे तेरा नाम

दिल कैसे तुझको पेश करूँ, दम तो ज़रा निकलने दे /

-- शांतनु सान्याल